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आर्थिक तंगी के दौर से गुजरती अर्थव्यवस्था , सम्पादकीय

Rashtriya Khabar 2018-01-13 18:34:51
देश में आर्थिक हालात अब भी नहीं संभल पाये हैं। नोटबंदी के बाद से जो हालात पैदा हुए थे, उनमें अब भी सुधार नहीं हो पाया है। दूसरी तरफ भारतीय बैंक अब तक सिर्फ और सिर्फ गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के पैसे से ही अपना कार्य संचालन कर रहे हैं।
नतीजा है कि बैंकों को भारतीय रिजर्व बैंक के कड़े मापदंडों का पालन करना पड़ रहा है। बार बार ब्याज दर कम होने से उत्पादन में जुटी कंपनियों के पास भी नकदी का प्रवाह बाधित हो रहा है। इससे स्थिति और भी बिगड़ रही है। दूसरी तरफ देश का कृषि उत्पादन अब भी अच्छी स्थिति में नहीं है।
लगातार आश्वासन के बाद भी किसानों को कर्ज माफी का वह लाभ नहीं मिल पाया है, जिसके वे हकदार थे तथा चुनाव में वर्तमान सरकार के लोगों ने जिसकी हिमायत भी की थी। दूसरी तरफ चुनाव के पूर्व जिस विदेशी पूंजी निवेश का ये लोग विरोध कर रहे थे, उसे अब पहले के मुकाबले और अधिक उदारता के साथ स्वीकार कर लिया गया है।
आलोचन जारी रहने के बीच यह माना जा सकता है कि प्रत्यक्ष और परोक्ष विदेशी पूंजी निवेश का प्रवाह बढ़ने से देश की औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों को थोड़ा वल अवश्य मिलेगा। लेकिन इसके लिए भी सरकारी स्तर पर काम काज के तौर तरीकों को बदलना होगा।
वर्तमान में खासतौर पर सरकारी भ्रष्टाचार के मानदंड में सरकारी विभाग ही सबसे ऊपर आते हैं। इन विभागों में काम कराने के लिए हर दरवाजे पर पैसे की मांग की जाती है। इस किस्म की कार्यसंस्कृति किसी भी विदेशी कंपनी को पसंद नहीं है। अन्य देशों में कारोबार को जिस स्तर पर सरकारी समर्थन प्राप्त होता है, वैसा माहौल नहीं होने की वजह से भी अनेक निवेशक अन्यत्र चले जाने पर मजबूर हुए हैं।

आर्थिक तंगी का असली हाल बयां करता है मोबाइल कारोबार

इसका जीता जागता उदाहरण देश का मोबाइल कारोबार है। सभी जानते हैं कि भारत इस मोबाइल जगत का सबसे तेजी से बढ़ता बाजार है। इसकी मांग को देखते हुए अनेक भारतीय कंपनियां भी प्रतिस्पर्धा में उतर गयी हैं। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि भारत क्या अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी भारतीय बाजार में चीन के मोबाइल का मुकाबला नहीं कर पा रही है।
देश में मोबाइल और टेलीकॉम उपकरणों के निर्माण में तेजी लाने के बावजूद इस क्षेत्र में चीन निर्मित उत्पादों की हिस्सेदारी में बढ़ोतरी का रुख बना हुआ है। मेक इन इंडिया के तहत दिये जा रहे प्रोत्साहन के बावजूद देश का मोबाइल हैंडसेट और दूरसंचार उपकरण निर्माण उद्योग आयात पर आधारित है।
देश के कुल आयात में इस उद्योग की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है और अभी यह 26.4 प्रतिशत है। इसमें चीन निर्मित उत्पादों की हिस्सेदारी भी बढ़ी है। वर्ष 2012-13 में चीनी उत्पादों की हिस्सेदारी 64.3 प्रतिशत थी जो वर्ष 2016-17 में बढ़कर 69.4 प्रतिशत पर पहुंच गयी।
रिपोर्ट के अनुसार, आयात पर निर्भरता के कारण भारतीय विनिर्माता उत्पादों का मूल्य संवर्धन बहुत कम कर पा रहे हैं। इसमें कहा गया है कि मोबाइल और टेलीकम्युनिकेशंस उपकरण की मेक इन इंडिया अभियान में भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन देश में मोबाइल फोन के उपयोग में हो रही बढ़ोत्तरी की पूर्ति आयात के जरिये पूरी की जा रही है।
इन आंकड़ों से अलग मोबाइल की कीमतों का युद्ध भी भारत को पीछे धकेल रहा है। ऐेसे में फिर से ब्याज दरों में कटौती से भारतीय कंपनियों के समक्ष नकदी का संकट आ सकता है। पिछले कुछ वर्षों से कंपनियां ऋण बाजार के मुकाबले रकम जुटाने के लिए दूसरे स्रोतों का इस्तेमाल करती रही हैं।
इसकी वजह यह थी कि बैंक ब्याज दरें कम करने के लिए तैयार नहीं थे, जबकि नियत आय वाले बाजार ने नीतिगत दरों में कटौती के अनुसार दरें निर्धारित कीं। हालांकि बैंकों की ब्याज दरें घटने के बाद एक बार फिर कर्ज के लिए कंपनियां बैंकों तक पहुंच सकती हैं।
पहले के मुकाबले बैंक अब ऋण देने के लिए उत्सुक हैं और ग्राहकों की सुविधाओं के अनुसार से तेजी से ऋण आवंटित कर रही हैं। ऋण बाजार में अपनी हिस्सेदारी दोबारा हासिल करने के लिए बैंक ऐसे समय में उत्सुकता दिखा रहे हैं जब दरें ऊंचे स्तर पर जा रही हैं।
साल के शुरू में एसबीआई ने अपनी आधार दर में 30 प्रतिशत कमी कर सबको चौंका दिया। एसबीआई के दरें घटाने के बाद दूसरे बैंकों के लिए भी उधारी दर बढ़ाना अब मुश्किल हो गया है। लेकिन इन तमाम तथ्यों के बीच जो सवाल अब भी सबसे अहम बना हुआ है, वह है बड़े बकायेदारों के पास बकाया धन और उसकी वसूली के तौर-तरीके।
बैंकों ने स्पष्ट दिखा दिया है कि उनकी मंशा बड़े बकायेदारों की पहचान गुप्त रखने की है। यह स्थिति तब है जबकि विजय माल्या का मामला पूरी दुनिया के सामने आ चुका है। इसलिए जब तक बड़े बकायेदारों के प्रति बैंकों का रुख नहीं बदलेगा, आम ग्राहक बैंकों की तरफ संदेहभरी नजरों से देखता ही रहेगा।