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चाबहार के बाद अब ओमान के जरिए चीन के बढ़ते कदमों पर ब्रेक लगाएगा 'भारत'

Kakkajee 2018-02-14 16:00:00

नई दिल्‍ली । चीन लगातार भारत को घेरने की जो कवायद कर रहा है वह वास्‍तव में भारत को परेशान करने वाली है। चीन ने इसमें अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। चीन की नई रणनीति में भारत के पड़ोसी देशों में बंदरगाहों के निर्माण में अपना सहयोग देने के नाम पर काफी बड़ा निवेश किया जा रहा है। म्‍यांमार, बांग्‍लादेश, श्रीलंका, पाकिस्‍तान और मालद्वीप में चीन इसी तर्ज पर आगे बढ़ रहा है। इसके अलावा वह अफ्रीकी महाद्वीप स्थित जिबूती में अपनी नौसेना का बेस बनाने के बाद अब वह नामिबिया में भी एक बंदरगाह के निर्माण में जुटा है। चीन की यह पूरी कवायद भारत पर रोक लगाने और उस पर करीबी निगाह रखने को लेकर की जा रही है। चीन यह भी मानता है कि दक्षिण एशिया में भारत की जो स्थिति है वह उसके लिए खतरनाक साबित हो सकती है। चीन के यही बढ़ते कदम भारत के लिए भी पेरशानी का सबब बनते जा रहे हैं। लेकिन अब भारत को इसका जवाब मिल गया है। भारत अब ओमान के रास्‍ते चीन के इन बढ़ते कदमों पर ब्रेक लगाने की तरफ आगे बढ़ चुका है।

आपको बता दें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया विदेश दौरे में ओमान भी शामिल था। इस दौरे पर भारत को एक बड़ी रणनीतिक कामयाबी मिली। इसके तहत दोनों देशों के बीच एक अहम रणनीतिक समझौते पर हस्ताक्षर हुए। समझौते के मुताबिक भारतीय नौसेना को ओमान के दुक्म पोर्ट तक पहुंच हासिल हो गई है। पश्चिमी हिंद महासागर में भारत की पहुंच के हिसाब से यह समझौता काफी अहम है जिसके दूरगामी परिणाम आने वाले दिनों में देखने को मिलेंगे। भारत से पहले दुक्‍म में अमेरिका 2013-14 में ही अपनी मौजूदगी मजबूत कर चुका है। इसके अलावा ब्रिटेन भी ऐसा कर चुका है। चीन ने भी यहां भारी निवेश किया है। चीन ने अगस्त 2016 में दुक्म पोर्ट पर 35 करोड़ डॉलर (2,246 करोड़ रुपये) से ज्यादा का निवेश किया था।


भारत के लिए ओमान की अहमियत


भारत के ओमान के साथ लंबे और करीबी राजनीतिक संबंध रहे हैं। ओमान की भारत के लिए भू-रणनीतिक अहमियत है, क्योंकि वह पर्सियन गल्फ और हिंद महासागर के महत्वपूर्ण जलमार्ग पर स्थित है। इसके अलावा, ओमान उस क्षेत्र में वास्तविक 'गुट-निरपेक्ष' देश है। वह अरब जीसीसी का हिस्सा तो है लेकिन उसके ईरान के साथ भी गहरे संबंध हैं। ईरान के साथ न्यूक्लियर डील पर बातचीत के लिए अमेरिका ने ओमान की मदद ली थी। इसके अलावा ओमान की मदद के बाद ही यमन में ISIS के कब्जे से भारतीय फादर टॉम को सकुशल मुक्त कराया गया था। चूंकि भारत खाड़ी के देशों के साथ रिश्तों को और प्रगाढ़ करने में लगा है। ऐसे में ओमान की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है।


दुक्म कोई प्राकृतिक बंदरगाह नहीं है, बल्कि यह कृत्रिम है जिसे विशुद्ध आर्थिक और रणनीतिक उद्देश्य से बनाया गया है। चीन जिस तरह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को विकसित कर रहा है, उसे देखते हुए दुक्म में भारत की मौजूदगी रणनीतिक तौर पर काफी अहम है। इसके जरिए भारत चीन को गल्फ ऑफ ओमान के मुहाने पर रोकने में सक्षम हो जाएगा। ग्वादर पर कभी ओमानी सुल्तान का हक था और उन्होंने 1950 के दशक में भारत को इससे जुड़ने की पेशकश की थी। उस समय भारत ने उस पेशकश को यह कहकर नामंजूर कर दिया था कि वह इसे पाकिस्तान से नहीं बचा पाएगा।


चाबहार के जरिए भारत ने बढ़ाए कदम


ओमान में मिली सफलता से पहले भारत ईरान में चाबहार पोर्ट के जरिए इस पूरे इलाके में चीन-पाक के खिलाफ एक मानोवैज्ञानिक बढ़त बना चुका है। पाकिस्तान को बाईपास करते हुए चाबहार पोर्ट पहुंचना भारत के लिए रणनीतिक और राजनीतिक जीत है। मई 2016 में पीएम मोदी की मौजूदगी में इसके लिए ट्राईलेटरल एग्रीमेंट हुआ था। इसके तहत भारत ने पहले चरण के विकास में करीब 85.21 मिलियन डालर का निवेश किया है। इसके अलावा भारत फीस के रूप में ईरान को दस साल में 22.95 मिलियन डालर देगा। इतना ही नहीं ईरान भारत को चाबहार पोर्ट का मैनेजमेंट भी देने को राजी हो गया है। इसका मतलब यह हुआ कि भारत इस पोर्ट का अपने जरूरतों के लिहाज से इस्‍तेमाल कर सकेगा। इसके चलते उसे ग्‍वादर में चीन पाक पर रणनीतिक रूप से बढ़त भी मिल सकेगी।


सेशल्स और मॉरिशस में भारत की मौजूदगी


आपको बता दें कि भारत सेशल्‍स में भी मिलिट्री इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर तैयार करने की इजाजत मिल गई है। इसके अलावा मॉरिशस के साथ ऐसा ही समझौता पहले से भारत ने कर रखा है। इसका सीधा अर्थ यह है कि चीन की तरह ही भारत भी अपने कदम अब धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहा है। जहां तक सेशल्‍स से हुए समझौते की बात है तो यहां पर इसको लेकर घरेलू राजनीतिक विरोध था। इसके अलावा अगले माह भारत और यूएई संयुक्त सैन्य अभ्यास भी करने वाले हैं। ओमान की सेनाओं के साथ भारत की तीनों सेनाएं अभ्यास कर चुकी हैं।


जिबूती में भारतीय मिशन की शुरुआत


चीन ने अपनी रणनीति के तहत अफ्रीकन हॉर्न जिबूती में अपना पहला विदेशी नौसेनिक अडड़ा बनाया है। अब भारत भी इस ओर बढ़ रहा है। इसके तहत पिछले साल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जिबूती का दौरा किया था। यह उनका पहला विदेश दौरा भी था। उस वक्‍त जिबूती सरकार ने जिबूती में आर्थिक विकास में भारत की वृहद भूमिका का आह्वान किया था। जिबूती में भारतीय मिशन की शुरुआत के साथ हॉर्न ऑफ अफ्रीका के इस अहम देश के साथ इस साल भारत के राजनयिक रिश्ते शुरू हो सकते हैं। यह इस लिहाज से भी खास है क्‍योंकि जिबूति में पहले ही चीन की नौसेना का बेस है और नामिबिया में भी शायद आने वाले दिनों में यही देखने को मिलेगा। यहां आपको बताना जरूरी होगा कि वर्ष 2015 में यमन संकट के दौरान जिबूती राहत अभियान के तहत भारतीयों तथा अन्य देशों के नागरिकों को निकालने की भारतीय कोशिशों में सहयोगकारी रहा था और उसने अपनी हवाई पट्टी उपलब्ध करायी थी। यमन से लोगों को निकालने के लिए भारत ने ऑपरेशन राहत नामक अभियान जिबूती से भी चलाया था। भारत का जिबूती के साथ 2016-17 में 28.4 करोड़ डालर का व्यापार था।