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नेपाल के साथ मजबूत होते रिश्ते

The Punchline Expose 2018-05-14 18:00:01

नेपाल के साथ मजबूत होते रिश्ते

शाह
भारत व नेपाल के बीच ऐतिहासिक व प्रगाढ़ संबंध रहे है और बीते सालों कुछ कड़वाहट के बाद अब फिर से रिश्ते पटरी पर आने लगे है। वैसे भी नेपाल से बरसों पुराने मजबूत रिश्ते रहे हैं उसकी तुलना किसी और द्विपक्षीय संबंध से नहीं की जा सकती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते नेपाल से भारत के रिश्ते की खास विशिष्टता को उभारने की एक नई पहल की। प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद नेपाल की यह उनकी तीसरी यात्रा थी। संभवतया अगले महीने मोदी फिर नेपाल जाएं, क्योंकि बिम्सटेक की शिखर बैठक होनी है। नेपाल हमारा पड़ोसी होने के साथ ही, दोनों देशों की सीमाएं भी एक दूसरे के लिए खुली हुई हैं। भारत ने नेपाल के लोगों को अपने यहां पढ़ाई और रोजगार करने आदि की सुविधा दे रखी है। भौगालिक, इतिहास, पुराण, धर्म, भाषा, संस्कृति के तमाम तार दोनों देशों को जोड़ते है। मोदी ने अपनी ताजा नेपाल दौरे को धार्मिक-सांस्कृतिक रंग देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। इसके पीछे सियासी वजह भी हो सकती है। इसके साथ ही एक कारण चीन की नेपाल से बढी नजदीकियां भी हो सकता है। पिछले कुछ समय से चीन ने निवेश और अनेक बड़ी परियोजनाओं में वित्तीय मदद के बल पर नेपाल में अपनी साख बढ़ाई है। इस मामले में चीन से बराबरी करने के चक्कऱ ने सिर्फ कड़वाहट बढ़ाई है, शायद इस वजह से भारत सरकार को लगा होगा कि उस दौड़ में पडऩे के बजाय पड़ोसी देशों से पुरानी नजदीकियों को नए सिरे से मजबूत करने की जरूरत है। वैसे भी भारत की नेपाल के साथ तो हमेशा ही नजदीकी रही है लेकिन पिछले तीन सालों में कम से कम दो तीन ऐसे बड़े मौके रहे जब नेपाल में भारत के प्रति आक्रोश का माहौल बना। एक तो नया संविधान लागू होने के समय। नई बन रही राजनीतिक और विधायी व्यवस्था में मधेशियों तथा जनजातियों के प्रतिनिधित्व को लेकर भारत की चिंता के चलते नेपाल में ऐसा माहौल बना कि भारत सरकार बेवजह दखलंदाजी कर रही है। सितंबर 2015 में हुई नाकेबंदी भी तनाव का सबब बनी। अगर वह सब कड़वाहट खत्म हो जाए, तो मोदी के इस बार के नेपाल दौरे की इससे बड़ी सार्थकता और क्या हो सकती है।
वैसे मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री को भरोसा दिलाया है कि भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति में नेपाल का स्थान प्रथम होगा। इसी के साथ उन्होंने नेपाल की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना का शिलान्यास किया। नेपाल की यह शिकायत रही है कि भारत की मदद से शुरू हुई परियोजनाएं लंबे समय से लंबित हैं। यह असंतोष स्वाभाविक है और इसे दूर किया जाना चाहिए। हाल में मोदी चीन गए थे। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी शिखर वार्ता से एशिया की इन दो बड़ी ताकतों के आपसी रिश्तों में सुधार आने के संकेत मिले हैं।ं अब भारत नेपाल से संबंध सुधारने की कोशिश में है। गौरतलब है कि नेपाल की अपनी पहली यात्रा के दौरान मोदी ने पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की थी, इस बार जानकी मंदिर में की। इस मौके पर उन्होंने जनकपुर और आसपास के क्षेत्रों के विकास के लिए सौ करोड़ रु. का अनुदान देने की घोषणा की और नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के साथ मिलकर जनकपुर से अयोध्या के लिए सीधी बस सेवा को हरी झंडी दिखाई। इसी के साथ मोदी ने जनकपुर को पर्यटन के रामायण सर्किट से जोडऩे की घोषणा की, और यह भी बताया कि इसी प्रकार दोनों देशों के बौद्ध और जैन तीर्थ स्थलों के बीच आवाजाही की सुविधाएं शुरू करके पर्यटन के अन्य सर्किट भी विकसित किए जाएंगे। उस यात्रा के दौरान किए वादे को प्रधानमंत्री ने एक तरह से अब पूरा करने की पहल की है। वैसे भी अगर चीन से संबंध सुधार की कोशिश आगे बढ़ती है तो नेपाल के अलावा म्यांमा, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि से आपसी विश्वास बढ़ाने में भारत को आसानी होगी, क्योंकि तब शायद चीन कोई रणनीतिक अड़ंगा नहीं डालेगा। अभी तक चीन नेपाल सहित तमाम दूसरे पड़ोसियों से भारत के संबंध बिगाडऩे की कोशिश में लगा हुआ था और अब जब वह खुद दोस्ती के लिए कदम बढ़ा रहे हैं तो दूसरे पड़ोसियों से भारत के संबंध पहले से बेहतर हो सकेंगे।


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