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...और मैं बसंत हो गई!

MomEspresso Hindi 2019-01-10 08:10:02

"माँ तुम्हारी वो पीली साड़ी कहां रखी है, कहीं मिल नहीं रही?" नम्रता ने माँ की आलमारी खंगालते हुए पूछा। 

"वहीं आलमारी में तो रखी है, सबसे नीचे देखो नीली साड़ी के नीचे होगी." माँ ने रसोई से ही जबाब दिया। 

"नहीं मिल रही है माँ, आ के दे दो न। " नम्रता थोड़ी  झल्लाई। 

माँ रसोई से आईं और साड़ी निकाल कर पलंग पर रखते हुई बोली,"वैसे तुझे साड़ी क्यों चहिए, तू कब से साड़ी पहनने लगी?" 

"अरे मेरी प्यारी माँ, कल बताया तो था, कॉलेज में बसंतोत्सव का आयोजन है। तो सभी सहेलियों ने साड़ी पहनने का प्रोग्राम बनाया है." नम्रता ने लाड़ लड़ाया। 

नम्रता माँ से आँखें चुराते हुए अपने कमरे में चली गई। माँ हौले से मुस्काईं और रसोई की तरफ बढ़ीं।

काफी जद्दोजहद के बाद नम्रता ने साड़ी बाँधी, हाथों में चूड़ियां डाली, माथे पे छोटी सी बिंदी चिपकाई और आईने में खुद को निहारा... आज उसे खुद से रश्क़ हो रहा था।

माँ मेरा नाश्ता दे दो...नम्रता माँ के पीछे खड़ी थी। माँ एकटक देखती रह गयीं... आँखों से काजल ले कर एक नन्हा सा टीका लगा बोली, "नज़र ना लगे मेरी बच्ची।" फिर अपने गले की चेन उतार अपनी लाड़ली को पहनाते हुए बोली, "गला सूना लग रहा था"। 

माँ आप भी न... नम्रता के शर्म से लाल होते गाल उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे... चलो नाश्ता दो।

डिंग-डाँग... दरवाजे की घंटी बजते ही नम्रता भागी, "माँ शिवानी आ गई ,मैं चलती हूँ।आज आने में देर होगी।"

"क्या बात है मैडम, बड़ी गजब ढा रही हो।आज तो रोहन..." शिवानी ने नम्रता को छेड़ा।

"चुप हो जा, नहीं तो पिट जाएगी। ऐसा कुछ नहीं है हमारे बीच, वो तो बस कॉलेज मैगज़ीन में अपनी रचनाएँ छपवाने के सिलसिले में एक दो बार हमारी बात हुई है बस।" नम्रता ने प्यारी सी डाँट लगाई। 

"वैसे तू भी कुछ कम नहीं लग रही, दो-चार तो घायल हो ही जाएंगे।" अब शरमाने की बारी शिवानी की थी।

"चल छोड़ ये सब। ये बता आज स्टेज पे कौन सी कविता सुनाने वाली हो?" शिवानी ने पूछा। 

"अरे कहाँ यार मैं कुछ लिख ही नहीं पाई। सोच रही हूँ, शिप्रा मैडम को मना कर दूं।" नम्रता सोच में पड़ गई।

कॉलेज पहुँचते ही, शिवानी ने फिर से नम्रता को छेड़ा, "रोहन कहीं दिख नहीं रहा, आज आया नहीं क्या?" 

नम्रता उसे अनसुना करते हुए शिप्रा मैडम के केबिन की तरफ बढ़ गई, "मैं मैडम से मिल के आती हूँ।"

नम्रता जब वापिस आई, तो उसे शिवानी कहीं नज़र नहीं आई। उसने उसे हर जगह ढूँढा, वो कहीं नहीं मिली। शिवानी को ढूँढते-ढूँढते नम्रता कॉलेज के पिछले हिस्से में पहूँच गई, जहाँ दो पुरानी जर्जर हो चुकी बसें खड़ी थी। वहाँ कम ही लोग जाते थे।इसलिए, अक्सर प्रेमी जोड़े वहाँ एकांत में समय बिताते थे।

शिवानी यहाँ क्या करने आएगी?...  ये सोचती हुई नम्रता वापिस जाने को ज्यों ही मुड़ी, एक परिचित आवाज़ सुनकर उसके कदम रुक गए। वो ना चाहते हुए भी आगे बढ़ी। शिवानी और रोहन को आलिंगनबद्ध देख, कुछ पल को वह स्तब्ध रह गई।दूसरे ही पल मुस्कुराते हुए, वापिस लौट आई।

नम्रता आज समझ गई थी, कि उसकी प्यारी सहेली हर वक़्त रोहन का नाम ले कर, उसे क्यों छेड़ा करती थी। उसका तो बस एक ही उद्देश्य था, अपने प्रेमी का जिक्र पल-पल करने का सुकून महसूस करना; जरिया चाहे जो भी हो। 

नम्रता स्टेज की तरफ बढ़ी, हाथ में माइक ले कर बोलना शुरू किया... 

दोस्तों;

आज बसंतोत्सव के उपलक्ष्य में, मैं अपनी लिखी कुछ पंक्तियाँ सुनाना चाहती हूँ... 

फिर आज बसंती बयार, बही॥ 

फिर आज कोयल की कूक, गूंजी॥

फिर आज सरसों के सारे खेत,  पीले-पीले फूलों से सजे॥

फिर आज पेड़ों की शाखाएँ, नन्हे-नन्हे पत्तों से सजीं॥

ये बयार अपने संग ले कर के, फिर प्यार की खुशबू आई है॥ 

जब जब मैंने तेरा नाम लिया, फिर मन में उमंग जगाई है॥

फिर आज बसंत दिल में छाया, और आज हुआ मन बासन्ती... 

धन्यवाद्॥


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