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कैंसर पीड़ितों के लिए जी का जंजाल साबित हो रही आयुष्मान योजना, पेचीदा प्रक्रिया से कतरा रहे लाभार्थी

Eenadu India 2019-01-12 21:37:00

प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल आईजीएमसी में कैंसर जैसी बीमारी से लड़ रहे रोगियों को सबसे ज्यादा दिक्कत आयुष्मान योजना के तहत आ रही है. उनका कहना है कि उन्हें न तो इलाज का पूरा खर्च मिल पा रहा है और योजना का लाभ लेने के लिए इतने चक्कर काटने को मजबूर हैं.

सबसे बड़ी परेशानी जो लाभार्थी को इस योजना के तहत आ रही है, वो ये कि बीमारी के इलाज के लिए पैसे पैकेज के हिसाब से दिए जा रहे हैं. ऐसे में अगर कैंसर से पीड़ित रोगी की बात की जाए, तो उसमें इलाज के हिसाब से अलग-अलग साइकल का पैकेज डॉक्टर तय कर रहे हैं. इस पैकेज के तहत किसी को 3 तो किसी को 6 हजार रुपये मिलते हैं, जिसमें सभी दवाइयों की खरीद भी पूरी नहीं हो पाती.



बीमारी के आधार पर इलाज का पैकेज बनता था, लेकिन अब लिखी गई दवा के आधार पर टुकड़ों में पैकेज तय हो रहा है. इससे कैंसर मरीजों की एक कीमोथेरेपी का खर्चा भी पूरा नहीं हो पा रहा है.



पैकेज में कई दवाइयां ऐसी शामिल होती हैं, जिनकी कीमत तय पैकेज से भी ज्यादा होती है जिसे रोगी को अपनी जेब से अदा करना पड़ता है. ऐसे में योजना के तहत जो लाभ उन्हें मिलना चाहिए वो नहीं मिल पाता है. इसके साथ ही इस पैकेज को अप्रूव करवाने के लिए भी जो प्रक्रिया योजना के तहत तय की गई है, उसने तो बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की परेशानी को दोगुना कर रखा है. औपचारिकताएं पूरी होने के बाद दोबारा आयुष्मान काउंटर पर पहले से अप्रूव्ड पैकेज की मंजूरी लेना जरूरी है. ये मंजूरी चंडीगढ़ स्थित उस कंपनी से आती है, जिसके पास यह हेल्थ बीमा है वहां भी डॉक्टर बैठे हैं, पैकेज बदल देते हैं.

आयुष्मान के तहत मुफ्त दवाईयां लेने के लिए पर्ची पर तीन जगहों पर साइन करवाने पड़ रहे हैं. इसमें पहले वार्ड में नर्स फिर मरीज को नर्सिंग सुपरिटेंडेंट से साइन करवाने के बाद डॉक्टर के साइन करवाना जरूरी होता है जिसके बाद ही दवाएं मिलेंगी. योजना के तहत वैसे तो हर रोगी जो इसका लाभार्थी हैं, का एक कार्ड बना हुआ है, लेकिन इसके बाद भी वेरिफिकेशन की प्रक्रिया खत्म होने का नाम नहीं लेती. जो कैंसर पीड़ित व्यक्ति इस योजना का लाभ ले रहा हैं और मात्र दवाई लेने के लिए अस्पताल आया है, उसे हर बार अस्पताल आने पर पहले एडमिशन की प्रक्रिया पूरी करनी होती है और उसके बाद डिस्चार्ज भी लेना जरुरी है जिसके बाद ही कार्ड पर मुफ्त दवाईयां मिल पाती हैं.

ऐसे में अगर कोई रोगी माह में तीन या चार बार अस्पताल आता है तो उसे इस प्रक्रिया को हर बार पूरा करना पड़ता है. इतना हो नहीं आईजीएमसी में कैंसर अस्पताल और आयुष्मान योजना के काउंटर के साथ ही जेनेरिक स्टोर जहां से योजना के तहत तय पैकेज के आधार पर मुफ्त दवाइयां मिलती हैं, उसमें काफी दूरी है. सैकड़ों सीढ़िया चढ़ कर रोगी को पैदल चलकर कैंसर अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक के कई चक्कर काटने पड़ते हैं, जिसे पूरा करते हुए रोगी की हालत और उसके साथ आए तमीरदार को दिक्कतों से झूझना पड़ रहा है. इन सब दिक्कतों से लोग इतना परेशान है कि इस योजना का लाभ ही नहीं लेना चाहते.

 


आईजीएमसी के कैंसर अस्पताल में इलाज के लिए आए एक कैंसर पीड़ित रोगी ने ही बताया कि आयुष्मान के तहत एक तो बीमारी के इलाज के लिए जो पैसे पैकेज में मिलते हैं, खर्च उससे अधिक होता है. पैकेज में जो दवाइयां लिखी होती है, उसे लेने के लिए कई चक्कर ओर कई जगह साइन करवाने पड़ते है. बीमारी के चलते उन्हें चलने में भी परेशानी है. लोगों ने कहा कि इस तरह का कोई प्रावधान किया जाना चाहिए कि एक कैंसर अस्पताल में ही पूरी प्रक्रिया जो सके और जो मरीज इतना चल फिर नहीं सकता वो आराम से अपना इलाज करवा सके.

वहीं, अस्पताल प्रशासन का इन सब परेशानियों को लेकर एक ही तर्क है कि योजना को लागू करने के जो नियम है, उन्हें पूरा किया जाना जरूरी है. बार-बार वेरिफिकेशन के पीछे भी यही तर्क दिया जा रहा है कि योजना के तहत पैसों का लाभ कोई और ना उठा ले इसके लिए यह वेरिफिकेशन होना जरूरी है, लेकिन मरीजों को इससे कितनी परेशानी हो रही है, इसका जवाब अस्पताल प्रशासन अपने इन्ही तर्कों से टालने के प्रयास करता दिख रहा है. हालांकि योजना की प्रक्रिया से ना केवल मरीज बल्कि डॉक्टर-नर्सेज भी परेशान हैं.



आयुष्मान योजना के तहत हालात ये हैं कि वेरिफिकेशन के लिए मरीज का फोटो आईजीएमसी में बनाए काउंटर पर चिपकाए जियो के नंबर पर व्हाट्सएप्प करना होगा. हालांकि मरीज का कार्ड पहले ही बना है, लेकिन इसके बाद भी फोटो देना जरूरी है. दूरदराज से आए मरीज अब भी की-पैड वाले पुराने मोबाइल प्रयोग करते हैं. मरीज यदि बुजुर्ग दंपत्ति हैं, तो भी व्हाट्सएप्प संस्कृति से वाकिफ नहीं हैं. कैंसर अस्पताल में कई बुजुर्ग मरीज व्हाट्सएप्प के कारण बिना इलाज भटकते हुए मिल रहे हैं.

आईजीएमसी अस्पताल के एमएस डॉ. जनक राज ने कहा कि आयुष्मान योजना को लेकर भ्रांतियां फैलाई जा रही है, जबकि इस योजना के तहत हर बिमारी का एक अलग कोड है. इसमें संभावित बिमारियों के खर्चे भी दर्शाए गए हैं. कई बार मरीज का इलाज संभावित खर्चे से ज्यादा हो जाता है और इसके लिए मुख्यमंत्री ने निर्देश भी दिए हैं कि बाहर से दवाई न मंगवाई जाए. अस्पताल प्रशासन रोगी कल्याण समिति से ही उन्हें दवाईयां मुहैया करवा रहा है. उन्होंने कैंसर अस्पताल में आयुष्मान काउंटर खोलने की बात की और कहा कि मरीजों को आईजीएमसी और एमएस कार्यालय चक्कर न काटने पड़े, इसके लिए दवाई भी कैंसर अस्पताल में ही मुहैया करवाई जाएगी.


प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल आईजीएमसी में कैंसर जैसी बीमारी से लड़ रहे रोगियों को सबसे ज्यादा दिक्कत आयुष्मान योजना के तहत आ रही है. उनका कहना है कि उन्हें न तो इलाज का पूरा खर्च मिल पा रहा है और योजना का लाभ लेने के लिए इतने चक्कर काटने को मजबूर हैं.
सबसे बड़ी परेशानी जो लाभार्थी को इस योजना के तहत आ रही है, वो ये कि बीमारी के इलाज के लिए पैसे पैकेज के हिसाब से दिए जा रहे हैं. ऐसे में अगर कैंसर से पीड़ित रोगी की बात की जाए, तो उसमें इलाज के हिसाब से अलग-अलग साइकल का पैकेज डॉक्टर तय कर रहे हैं. इस पैकेज के तहत किसी को 3 तो किसी को 6 हजार रुपये मिलते हैं, जिसमें सभी दवाइयों की खरीद भी पूरी नहीं हो पाती.

बीमारी के आधार पर इलाज का पैकेज बनता था, लेकिन अब लिखी गई दवा के आधार पर टुकड़ों में पैकेज तय हो रहा है. इससे कैंसर मरीजों की एक कीमोथेरेपी का खर्चा भी पूरा नहीं हो पा रहा है.

पैकेज में कई दवाइयां ऐसी शामिल होती हैं, जिनकी कीमत तय पैकेज से भी ज्यादा होती है जिसे रोगी को अपनी जेब से अदा करना पड़ता है. ऐसे में योजना के तहत जो लाभ उन्हें मिलना चाहिए वो नहीं मिल पाता है. इसके साथ ही इस पैकेज को अप्रूव करवाने के लिए भी जो प्रक्रिया योजना के तहत तय की गई है, उसने तो बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की परेशानी को दोगुना कर रखा है. औपचारिकताएं पूरी होने के बाद दोबारा आयुष्मान काउंटर पर पहले से अप्रूव्ड पैकेज की मंजूरी लेना जरूरी है. ये मंजूरी चंडीगढ़ स्थित उस कंपनी से आती है, जिसके पास यह हेल्थ बीमा है वहां भी डॉक्टर बैठे हैं, पैकेज बदल देते हैं.

आयुष्मान के तहत मुफ्त दवाईयां लेने के लिए पर्ची पर तीन जगहों पर साइन करवाने पड़ रहे हैं. इसमें पहले वार्ड में नर्स फिर मरीज को नर्सिंग सुपरिटेंडेंट से साइन करवाने के बाद डॉक्टर के साइन करवाना जरूरी होता है जिसके बाद ही दवाएं मिलेंगी. योजना के तहत वैसे तो हर रोगी जो इसका लाभार्थी हैं, का एक कार्ड बना हुआ है, लेकिन इसके बाद भी वेरिफिकेशन की प्रक्रिया खत्म होने का नाम नहीं लेती. जो कैंसर पीड़ित व्यक्ति इस योजना का लाभ ले रहा हैं और मात्र दवाई लेने के लिए अस्पताल आया है, उसे हर बार अस्पताल आने पर पहले एडमिशन की प्रक्रिया पूरी करनी होती है और उसके बाद डिस्चार्ज भी लेना जरुरी है जिसके बाद ही कार्ड पर मुफ्त दवाईयां मिल पाती हैं.

ऐसे में अगर कोई रोगी माह में तीन या चार बार अस्पताल आता है तो उसे इस प्रक्रिया को हर बार पूरा करना पड़ता है. इतना हो नहीं आईजीएमसी में कैंसर अस्पताल और आयुष्मान योजना के काउंटर के साथ ही जेनेरिक स्टोर जहां से योजना के तहत तय पैकेज के आधार पर मुफ्त दवाइयां मिलती हैं, उसमें काफी दूरी है. सैकड़ों सीढ़िया चढ़ कर रोगी को पैदल चलकर कैंसर अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक के कई चक्कर काटने पड़ते हैं, जिसे पूरा करते हुए रोगी की हालत और उसके साथ आए तमीरदार को दिक्कतों से झूझना पड़ रहा है. इन सब दिक्कतों से लोग इतना परेशान है कि इस योजना का लाभ ही नहीं लेना चाहते.
 
आईजीएमसी के कैंसर अस्पताल में इलाज के लिए आए एक कैंसर पीड़ित रोगी ने ही बताया कि आयुष्मान के तहत एक तो बीमारी के इलाज के लिए जो पैसे पैकेज में मिलते हैं, खर्च उससे अधिक होता है. पैकेज में जो दवाइयां लिखी होती है, उसे लेने के लिए कई चक्कर ओर कई जगह साइन करवाने पड़ते है. बीमारी के चलते उन्हें चलने में भी परेशानी है. लोगों ने कहा कि इस तरह का कोई प्रावधान किया जाना चाहिए कि एक कैंसर अस्पताल में ही पूरी प्रक्रिया जो सके और जो मरीज इतना चल फिर नहीं सकता वो आराम से अपना इलाज करवा सके.

वहीं, अस्पताल प्रशासन का इन सब परेशानियों को लेकर एक ही तर्क है कि योजना को लागू करने के जो नियम है, उन्हें पूरा किया जाना जरूरी है. बार-बार वेरिफिकेशन के पीछे भी यही तर्क दिया जा रहा है कि योजना के तहत पैसों का लाभ कोई और ना उठा ले इसके लिए यह वेरिफिकेशन होना जरूरी है, लेकिन मरीजों को इससे कितनी परेशानी हो रही है, इसका जवाब अस्पताल प्रशासन अपने इन्ही तर्कों से टालने के प्रयास करता दिख रहा है. हालांकि योजना की प्रक्रिया से ना केवल मरीज बल्कि डॉक्टर-नर्सेज भी परेशान हैं.

आयुष्मान योजना के तहत हालात ये हैं कि वेरिफिकेशन के लिए मरीज का फोटो आईजीएमसी में बनाए काउंटर पर चिपकाए जियो के नंबर पर व्हाट्सएप्प करना होगा. हालांकि मरीज का कार्ड पहले ही बना है, लेकिन इसके बाद भी फोटो देना जरूरी है. दूरदराज से आए मरीज अब भी की-पैड वाले पुराने मोबाइल प्रयोग करते हैं. मरीज यदि बुजुर्ग दंपत्ति हैं, तो भी व्हाट्सएप्प संस्कृति से वाकिफ नहीं हैं. कैंसर अस्पताल में कई बुजुर्ग मरीज व्हाट्सएप्प के कारण बिना इलाज भटकते हुए मिल रहे हैं.

आईजीएमसी अस्पताल के एमएस डॉ. जनक राज ने कहा कि आयुष्मान योजना को लेकर भ्रांतियां फैलाई जा रही है, जबकि इस योजना के तहत हर बिमारी का एक अलग कोड है. इसमें संभावित बिमारियों के खर्चे भी दर्शाए गए हैं. कई बार मरीज का इलाज संभावित खर्चे से ज्यादा हो जाता है और इसके लिए मुख्यमंत्री ने निर्देश भी दिए हैं कि बाहर से दवाई न मंगवाई जाए. अस्पताल प्रशासन रोगी कल्याण समिति से ही उन्हें दवाईयां मुहैया करवा रहा है. उन्होंने कैंसर अस्पताल में आयुष्मान काउंटर खोलने की बात की और कहा कि मरीजों को आईजीएमसी और एमएस कार्यालय चक्कर न काटने पड़े, इसके लिए दवाई भी कैंसर अस्पताल में ही मुहैया करवाई जाएगी.