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100 करोड़ की वसूली का मामला: उद्धव सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका, अनिल देशमुख के खिलाफ CBI जांच जारी रहेगी - Dainik Bhaskar

India News Nine 2021-04-08 17:31:06
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  • Anil Deshmukh Supreme Court Hearing Update; Parambir Singh | Uddhav Thackeray Sharad Pawar Govt, Maharashtra Home Minister


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सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार और उसके पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख की अर्जी खारिज कर दी है। दोनों ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें 100 करोड़ की वसूली के आरोपों की CBI जांच का आदेश दिया गया था। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने देशमुख पर वसूली का टारगेट देने के आरोप लगाए थे।



इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा, ‘यह 2 बड़े पदों पर बैठे लोगों से जुड़ा मामला है। लोगों का भरोसा बना रहे, इसलिए निष्पक्ष जांच जरूरी है। हम हाईकोर्ट के आदेश में दखल नहीं देंगे। CBI की तरफ से की जा रही प्राथमिक जांच जारी रहेगी।’



सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय किशन कौल और हेमंत गुप्ता की बेंच ने इस मामले में महाराष्ट्र सरकार और देशमुख की अर्जियों पर सुनवाई की। अनिल देशमुख की तरफ से कांग्रेस नेता और वकील कपिल सिब्बल ने पैरवी की। वहीं महाराष्ट्र सरकार की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी ने पैरवी की।



फैसले से पहले कपिल सिब्बल ने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि सुप्रीम कोर्ट ये नियम बना दे कि बड़े पद पर बैठा व्यक्ति किसी दूसरे बड़े व्यक्ति पर आरोप लगाए तो सीधे जांच हो। इस पर जस्टिस गुप्ता ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि ऐसी स्थिति न आए, जहां DGP गृह मंत्री पर आरोप लगाए।



कोर्ट रूम LIVE



जस्टिस कौल: जब गृह मंत्री पर आरोप पुलिस कमिश्नर ने लगाए हों तो क्या यह CBI जांच के लिए फिट मामला नहीं है?



सिंघवी: वे गृह मंत्री नहीं हैं।



जस्टिस कौल: उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश के बाद पद छोड़ा है।



सिंघवी: लेकिन मामला CBI को इसलिए दिया गया कि वे गृह मंत्री हैं। अब उन्होंने पद छोड़ दिया है।



सिंघवी: जब राज्य सरकार ने आयोग बनाया तो उन्होंने पद छोड़ दिया।



जस्टिस गुप्ता: जी नहीं, उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश के बाद इस्तीफा दिया।



सिंघवी: महाराष्ट्र ने CBI के लिए जनरल कंसेंट वापस ले रखा है। राज्य सरकार को सुना जाना चाहिए था।



जस्टिस कौल: 2 बड़े पदों पर बैठे लोगों का मामला है। निष्पक्ष जांच जरूरी है।



सिब्बल: हमें (देशमुख को) सुना जाना चाहिए था।



जस्टिस गुप्ता: क्या आरोपी से पूछा जाता है कि FIR हो या नहीं?



सिब्बल: बिना ठोस आधार के आरोप लगाए गए।



जस्टिस कौल: यह आरोप ऐसे व्यक्ति का है, जो गृह मंत्री का विश्वासपात्र था। अगर ऐसा नहीं होता तो उसे कमिश्नर का पद नहीं मिलता। यह कोई राजनीतिक दुश्मनी का मामला नहीं है।



सिब्बल: मुझे CBI पर ऐतराज है।



जस्टिस गुप्ता: आप जांच एजेंसी नहीं चुन सकते।



बॉम्बे हाईकोर्ट ने दिया था CBI जांच का आदेश
इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जीएस कुलकर्णी की बेंच ने सोमवार को CBI से कहा था कि वह पिछले महीने पूर्व मुंबई पुलिस आयुक्त की ओर से जारी लेटर में उठाए गए मुद्दों पर 15 दिनों में अपनी प्रारंभिक जांच पूरी करे। इस फैसले के कुछ ही घंटे बाद देशमुख ने गृह मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था और फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।



इस बीच बुधवार को एंटीलिया केस में गिरफ्तार सचिन वझे ने एक लेटर में देशमुख पर वसूली के लिए कहने का आरोप लगाते हुए परमबीर सिंह के आरोप की एक तरह से पुष्टि कर दी। इस मामले की जांच के लिए CBI की टीम मुंबई में है और आज कुछ लोगों के बयान ले सकती है, जिनमें परमबीर सिंह भी शामिल हैं।



हाईकोर्ट ने कहा था- लोगों में यकीन पैदा करने के लिए CBI जांच जरूरी
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि मामले में स्वतंत्र एजेंसी की जांच नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और लोगों में यकीन पैदा करने के लिए जरूरी है। इसके साथ ही अदालत ने भ्रष्टाचार के आरोपों की CBI से जांच कराने का आदेश दे दिया था।



हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा था कि CBI को तुरंत FIR दर्ज करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि महाराष्ट्र सरकार ने इस मामले की जांच के लिए पहले ही एक हाई लेवल कमेटी बना दी है। मुख्य न्यायाधीश दत्ता ने कहा था कि हाई लेवल कमेटी के लिए राज्य सरकार की तरफ से लाया गया प्रस्ताव भरोसा दिलाता है कि इसमें किसी दखल की जरूरत नहीं है।



देशमुख पर परमबीर ने यह आरोप लगाया था
मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह ने 25 मार्च को बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर अर्जी में देशमुख के खिलाफ CBI जांच की मांग की थी। परमबीर सिंह ने दावा किया था कि देशमुख ने सस्पेंड पुलिस अधिकारी सचिन वझे समेत दूसरे अधिकारियों को बार और रेस्टोरेंट से 100 करोड़ रुपए की वसूली करने को कहा था। इस अर्जी पर हाईकोर्ट ने कहा था कि यह असाधारण मामला है, जिसमें स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जरूरत है।



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